Wednesday, 28 February 2018

शान्ति

शान्ति की चाह में करते युद्ध;
और इंसानियत की चाह में कत्ल,
मुर्दों की राख में बो रहे जीवन;
सींचकर पानी की जगह रक्त,
सैंकड़ों को कर अनाथ;
करते है सहानुभूति व्यक्त,
तबाह कर बिलखते बच्चों के आशियाने;
महलों में गुजारते है वक़्त।

Sketch-Er

Sunday, 25 February 2018

बचपन 2

शाम ढल गई;
पंछी घौसलों में गुम हो गए;

बचपन की मस्तियों में खोए थे हम;
नींद खुल गई;
और हम बड़े हो गए;

बड़ों की गोद सर रख;
कहानी सुने कई साल गुजर गए;

वक्त गुजरा;
और नाज़ुक से दिल ये अब सख्त हो गए;

हाथ पकड़ जिनके सीखे थे हम चलना;
आज उनके ही सहारे बन गए;

बड़े होने की जल्दबाजी में थे तब;
और आज उसे याद कर;
फिर बचपन को तरस गए|

Sketch-Er

Monday, 12 February 2018

बेवजह

बेवजह कुछ भी नही था;

यू कंही खो जाना;
और तन्हाई में वक़्त बिताना;

इन अल्फ़ाज़ों का यू बहकना;
और बहक कर कुछ कह जाना;

खामोशी में डूब जाना;
और फिर डूबकर तनिक मुस्कुराना;

बेवजह कुछ भी नही था!

Sketch-Er

अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी, और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी, जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी, परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी, व्याकुल सी नदी बह...