Thursday, 27 December 2018

यादें

कभी पल भर को तो कभी वक़्त की कमी सी मालूम होती है,
पर मुस्कुराहट के मोड़ पर मुलाक़ात तुझसे हर रोज होती है,
कभी शब्दों की कमी है तो कभी तू बे - अल्फ़ाज़ ही होती है,
दूर बेशक सही पर ख़्वाब में तू हर पल साथ ही होती है,
धीमें  से पुकार कर तू छिपी कंही आस पास ही होती है,
यूं तो सब ठीक है पर कभी कभी तेरी कमी महसूस होती है।

Wednesday, 12 December 2018

बहाना

दो पल का ठेहरना था;
फिर छोड़ कर जाना था;
कभी नजरें मिलाना तो कभी शर्माना था;
हर बार  बड़ी उम्मीद से आना जैसे कुछ कहना था;
और फिर यहाँ वहाँ की बातें कर पहेलियाँ बुझाना था;
जिस तरह आने का, ठीक उसी तरह जाने का भी बहाना था !

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Saturday, 3 November 2018

दो पल

धीमा था पहले थोड़ा सा,
अब तो जैसे थम सा गया,

नगद का उसूल था अब तक,
पर न जाने कब,
दो पल साथ गुजारे लम्हों का व्यस्त जिंदगी से उधार हो गया,

तन्हाई का शौक था कल तक,
पर अब नज़दीकियों का खौफ हो गया,

खामोश तो था अब तक,
पर अब बिना कुछ कहे ही काफी कुछ इजहार हो गया।

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Monday, 10 September 2018

रात

अक्सर एक ख़ामोश रात आती है, साथ में ढेरों अनकहे अल्फ़ाज़ लाती है, बीते वक़्त के पुराने कुछ पन्ने पलटा जाती है, पढ़कर कोई किस्सा पुराना सा; कानों में फुसफुसा जाती है, हर किस्सा एक याद; और हर याद एक दर्द साथ लाती है, कोशिशें की लाख; पर कम्बक्त वो रात अक्सर वापस लौट आती है! Sketch-Er

Monday, 20 August 2018

चाहत

इनकार नहीं करता,
और इजहार भी नहीं करता,
दोस्ती के प्याले में धीमी मिठास से परहेज़ भी नहीं करता,
और कड़वे सच के स्वाद से इनकार भी नहीं करता,
नजदीकियों की आग को धीमा भी नहीं करता,
और चाहत के परिंदे को आजाद भी नहीं करता|

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Monday, 18 June 2018

जिंदगी

जिंदगी बड़ी सस्ती हो चुकी है;
तूफ़ानी समंदर में कागज की कश्ती हो चुकी है;
शैतानी हाथों नीलाम हो चुकी है;
इक पिंजरा तन का है;
वरना छोड़ इसे जिंदगी कबकी फरार हो चुकी है !

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Tuesday, 29 May 2018

Ishaq!

न रुखसत किया और न ही हुआ हासिल;
न डूब पाया और न ही मिला साहिल;
न कोई क़त्ल हुआ पर फिर भी बदनाम हुआ क़ातिल;
न जाने कब और कैसे बाग़ी दिल हुआ इश्क़ काबिल|

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Friday, 25 May 2018

Golu

खुली किताब के अनलिखे अल्फ़ाज हूँ,
खुद में खोया सा बन्दा; पागल बेहिसाब हूँ,
कभी औरों से तो कभी खुद से नाराज़ हूँ,
कभी गंभीर तो कभी खुशमिजाज हूँ,
जिंदगी की महफ़िल में अक्सर शायराना अंदाज हूँ,
जो हो कोई गम तो हर दफा बाँटने मैं तैयार हूँ,
औरों की नज़र में अजीबोगरीब इंसान हूँ,
और अगर हो क़रीब तो अपनेपन का अहसास हूँ,
भागती सी जिंदगी; मैं जरा धीमी रफ्तार हूँ,
जो अगर हो हिम्मत तो मैं हास्य का भंडार हूँ,
सवाल हूँ जवाब हूँ सहनसीलता का इम्तेहान हूँ,
उम्मीद हो खत्म तो मैं हौसले का आगाज़ हूँ|

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Monday, 16 April 2018

इंसानियत

डरी थी,
सहमी थी,
हाथ जोड़ सैकड़ों दफा पैरों में पड़ी थी,

हवस थी,
हैवानियत थी,
और नन्ही सी जान आज अकेली खड़ी थी,

चीखी थी,
चिल्लाई थी,
पर पाक दरवाजों ने जैसे चुप्पी साध रखी थी,

मुस्लिम थी,
ईसाई थी,
या फिर हिन्दू थी,
क्या फर्क पड़ता है?
हवस की भूंख का निवाला बन फिर एक जिंदा लाश पड़ी थी,

जान थी,
बाकी अभी कुछ सांस थी,
और क्या होता बुरा?
जो जिंदा दफ़्न करने की जरूरत पड़ी थी।

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Sunday, 15 April 2018

खुशियाँ


तब खुशियाँ बहुत सस्ती थीं,
जिन्हें देख जिंदगी भी कभी हँसती थी,
चंद कागज के टुकड़ों में वो बसती थी,
जिसे ले भागने में अलग ही मस्ती थी,
तब खुशियाँ बहुत सस्ती थीं।
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Sunday, 25 March 2018

हालात

ख़यालात आज भी लिखे जाते हैं,
फिर अल्फ़ाज़ों के धागों में बुने जाते हैं,
दर्द दिलों के बयां किये जाते हैं,
फिर आँशुओ के सहारे धुले जाते हैं,
मुस्कुराहट की आड़ में छिपाये जाते हैं,
पर आँखों के हालात सच कह जाते है,
इश्क़ के पौधे जो बारिश में बेखबर बड़े हो जाते है,
अक्सर गर्मियों में सूख जाते हैं।

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Monday, 19 March 2018

वक़्त

वक़्त जो थमे कोई हर्ज़ नही,
सबके हिस्से में खुशी हो ये जरूरी भी नही,
जिक्र हुआ सिर्फ सुख का दुःख का कोई अर्ज़ नही,
थमा जो दुःख तो फिर कोई मर्ज़ नही,
गुजार सके इसे भी; वक़्त के सिवा किसी का फर्ज़ नही,
कोसा तो बेहिसाब इसे; पर कारनामें इसके कंही दर्ज़ नही|

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Friday, 9 March 2018

गुलाब

चले थे उस एक फूल की तलाश में,

सराबोर था भींगकर जो रंग गुलाल में,

थे हम उस रास्ते में हसीन से;
जख्म मिले कई;
संभलकर जिसमें चलने की फिराक़ में,

मोह के घोर अंधेपन में;
हुई भूल बरतने को एहतियात में,

खूबसूरत तो था बहुत;
पर छिपा रखे थे कांटे कई; कम्बक्त खूबसूरती के नक़ाब में।


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Wednesday, 28 February 2018

शान्ति

शान्ति की चाह में करते युद्ध;
और इंसानियत की चाह में कत्ल,
मुर्दों की राख में बो रहे जीवन;
सींचकर पानी की जगह रक्त,
सैंकड़ों को कर अनाथ;
करते है सहानुभूति व्यक्त,
तबाह कर बिलखते बच्चों के आशियाने;
महलों में गुजारते है वक़्त।

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Sunday, 25 February 2018

बचपन 2

शाम ढल गई;
पंछी घौसलों में गुम हो गए;

बचपन की मस्तियों में खोए थे हम;
नींद खुल गई;
और हम बड़े हो गए;

बड़ों की गोद सर रख;
कहानी सुने कई साल गुजर गए;

वक्त गुजरा;
और नाज़ुक से दिल ये अब सख्त हो गए;

हाथ पकड़ जिनके सीखे थे हम चलना;
आज उनके ही सहारे बन गए;

बड़े होने की जल्दबाजी में थे तब;
और आज उसे याद कर;
फिर बचपन को तरस गए|

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Monday, 12 February 2018

बेवजह

बेवजह कुछ भी नही था;

यू कंही खो जाना;
और तन्हाई में वक़्त बिताना;

इन अल्फ़ाज़ों का यू बहकना;
और बहक कर कुछ कह जाना;

खामोशी में डूब जाना;
और फिर डूबकर तनिक मुस्कुराना;

बेवजह कुछ भी नही था!

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Tuesday, 16 January 2018

बचपन

उम्र छोटी पर ख्वाहिशें बड़ी बड़ी;
मुट्ठी भर सिक्कों से जेबें भरी पड़ी;
उन सिक्कों के बोझ तले कुछ उम्मीदें दबी पड़ी;
खरीदने को कोई सल्तनत बड़ी;
डगमगाते कदमों से जिंदगी नन्ही सी फिर चल पड़ी।

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अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी, और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी, जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी, परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी, व्याकुल सी नदी बह...