Monday, 16 April 2018

इंसानियत

डरी थी,
सहमी थी,
हाथ जोड़ सैकड़ों दफा पैरों में पड़ी थी,

हवस थी,
हैवानियत थी,
और नन्ही सी जान आज अकेली खड़ी थी,

चीखी थी,
चिल्लाई थी,
पर पाक दरवाजों ने जैसे चुप्पी साध रखी थी,

मुस्लिम थी,
ईसाई थी,
या फिर हिन्दू थी,
क्या फर्क पड़ता है?
हवस की भूंख का निवाला बन फिर एक जिंदा लाश पड़ी थी,

जान थी,
बाकी अभी कुछ सांस थी,
और क्या होता बुरा?
जो जिंदा दफ़्न करने की जरूरत पड़ी थी।

Sketch-Er

Sunday, 15 April 2018

खुशियाँ


तब खुशियाँ बहुत सस्ती थीं,
जिन्हें देख जिंदगी भी कभी हँसती थी,
चंद कागज के टुकड़ों में वो बसती थी,
जिसे ले भागने में अलग ही मस्ती थी,
तब खुशियाँ बहुत सस्ती थीं।
Sketch-Er

अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी, और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी, जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी, परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी, व्याकुल सी नदी बह...