Thursday, 4 April 2019

अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी,
और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी,
जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी,
परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी,
व्याकुल सी नदी बहती एक पास थी,
खामोशियों में छेड़ी उसने जैसे कोई ताल थी,
हाथ में प्याला भर चाय लिए,
सजाई आसमान में तारो की पूरी बिसात थी,
वक़्त ने जरा घटाई अपनी रफ़्तार थी,
मानो जैसे जिंदगी महज एक ख़्वाब थी

ठंडी सी हवा किसी स्पर्श का एहसास थी,
मै था बेशक तन्हा पर; यादों की जैसे पूरी जमात थी,
आसमान से कहने को यूं तो ढेरों बात थी,
पर जुबां ना जाने क्यों आज फिर बे-अल्फ़ाज़ थी,
जलती हुई आग मानो जिदंगी का आगाज थी,
जवानी के आंगार में जैसे जम रही बुढ़ापे की राख थी,
दिमाग में चल रही विचारों की उथल पुथल बेहिसाब थी,
डगमगाती नाव ये आज फिर लहरों में उतरने जैसे तैयार थी,
मन मेरा रहस्यमय किताब की एक अधूरी शुरूआत थी,
पढ़ने गुजरा आधा वक़्त पर गुजारने बाकि अभी आधी रात थी।

Sketch-Er

Friday, 8 February 2019

दोस्ती

उम्मीद अभी बाकि है,
फैसले की तारिख़ अभी बाकि है,
एक गया तो क्या हुआ,
अभी साल और बहुत बाकि है,
वो तेरी किस्मत में न सही,
पर दुनिया लोग अभी और भी बाकि है,
दुनिया में मुश्किलें ढेरो सही,
पर साथ चलने को तेरे यार अभी काफी है,
ठुकरा भी दे जो अगर ये दुनिया,
तो मेरे दोस्त, दोस्ती के दामन में आग अभी बाकि है।

Skech-Er

दूरी

वो आज फिर कुछ इस तरह से मुस्कुरा रही है,
जैसे कंही दूर जा रही है,
यंहा वंहा की बातें कर,
बस नजरें चुरा रही है
चेहरे के नक़ाब तले,
न जाने क्या क्या खयालात छुपा रही है
कहना कुछ था,
और कहे कुछ और ही जा रही है,
धीमें ही सही,
पर अब दूर जाने की घड़ी नजदीक आ रही है,
वो आज फिर कुछ इस तरह से मुस्कुरा रही है,
जैसे कंही दूर जा रही है!

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Thursday, 10 January 2019

आज भी

खामोशियों में तेरे अल्फाजों की दस्तक जारी आज भी है,
कोशिशें भूल जाने की थी पूरी,
पर ख़यालो के दरमियान बगावत की बीमारी आज भी है,
निकला तो तन्हा ही था मैं,
पर बीते लम्हों की हर मोड़ में मिलने की तैयारी आज भी है,
मुस्कुरा कर गम भुलाया तो था ही सही,
पर मिल कर तुझसे खुदको भूल जाने की चाहत मुझे आज भी है।

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Thursday, 27 December 2018

यादें

कभी पल भर को तो कभी वक़्त की कमी सी मालूम होती है,
पर मुस्कुराहट के मोड़ पर मुलाक़ात तुझसे हर रोज होती है,
कभी शब्दों की कमी है तो कभी तू बे - अल्फ़ाज़ ही होती है,
दूर बेशक सही पर ख़्वाब में तू हर पल साथ ही होती है,
धीमें  से पुकार कर तू छिपी कंही आस पास ही होती है,
यूं तो सब ठीक है पर कभी कभी तेरी कमी महसूस होती है।

Wednesday, 12 December 2018

बहाना

दो पल का ठेहरना था;
फिर छोड़ कर जाना था;
कभी नजरें मिलाना तो कभी शर्माना था;
हर बार  बड़ी उम्मीद से आना जैसे कुछ कहना था;
और फिर यहाँ वहाँ की बातें कर पहेलियाँ बुझाना था;
जिस तरह आने का, ठीक उसी तरह जाने का भी बहाना था !

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Saturday, 3 November 2018

दो पल

धीमा था पहले थोड़ा सा,
अब तो जैसे थम सा गया,

नगद का उसूल था अब तक,
पर न जाने कब,
दो पल साथ गुजारे लम्हों का व्यस्त जिंदगी से उधार हो गया,

तन्हाई का शौक था कल तक,
पर अब नज़दीकियों का खौफ हो गया,

खामोश तो था अब तक,
पर अब बिना कुछ कहे ही काफी कुछ इजहार हो गया।

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अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी, और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी, जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी, परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी, व्याकुल सी नदी बह...