Thursday, 9 November 2017

न रही

दूर उससे तन्हा मैं कुछ यूँ जिया की उसकी मौजूदगी की अब जरूरत न रही,
याद उसे बेशक किया मगर अब कोई मजबूरी न रही,
हर लम्हा दिल मे महफूज़ रखा मगर अब उसके आने की उम्मीद न रही
वो गलियां यहां आज भी है पर चाहत उनमें फिरने की अब न रही,
चेहरे पर मुस्कुराहट आज भी है पर मुस्कुराने की वजह अब वो न रही!

Sketch-Er

अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी, और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी, जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी, परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी, व्याकुल सी नदी बह...