Thursday, 4 April 2019

अंधियारी रात

एक अंधियारी रात थी,
और घनघोर तन्हाई मेरे साथ थी,
जला कर रखी हमने जो थोड़ी आग थी,
परछाइयों में वो एक अलग ही कलाकार थी,
व्याकुल सी नदी बहती एक पास थी,
खामोशियों में छेड़ी उसने जैसे कोई ताल थी,
हाथ में प्याला भर चाय लिए,
सजाई आसमान में तारो की पूरी बिसात थी,
वक़्त ने जरा घटाई अपनी रफ़्तार थी,
मानो जैसे जिंदगी महज एक ख़्वाब थी

ठंडी सी हवा किसी स्पर्श का एहसास थी,
मै था बेशक तन्हा पर; यादों की जैसे पूरी जमात थी,
आसमान से कहने को यूं तो ढेरों बात थी,
पर जुबां ना जाने क्यों आज फिर बे-अल्फ़ाज़ थी,
जलती हुई आग मानो जिदंगी का आगाज थी,
जवानी के आंगार में जैसे जम रही बुढ़ापे की राख थी,
दिमाग में चल रही विचारों की उथल पुथल बेहिसाब थी,
डगमगाती नाव ये आज फिर लहरों में उतरने जैसे तैयार थी,
मन मेरा रहस्यमय किताब की एक अधूरी शुरूआत थी,
पढ़ने गुजरा आधा वक़्त पर गुजारने बाकि अभी आधी रात थी।

Sketch-Er

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