डरी थी,
सहमी थी,
हाथ जोड़ सैकड़ों दफा पैरों में पड़ी थी,
हवस थी,
हैवानियत थी,
और नन्ही सी जान आज अकेली खड़ी थी,
चीखी थी,
चिल्लाई थी,
पर पाक दरवाजों ने जैसे चुप्पी साध रखी थी,
मुस्लिम थी,
ईसाई थी,
या फिर हिन्दू थी,
क्या फर्क पड़ता है?
हवस की भूंख का निवाला बन फिर एक जिंदा लाश पड़ी थी,
जान थी,
बाकी अभी कुछ सांस थी,
और क्या होता बुरा?
जो जिंदा दफ़्न करने की जरूरत पड़ी थी।
Sketch-Er
सहमी थी,
हाथ जोड़ सैकड़ों दफा पैरों में पड़ी थी,
हवस थी,
हैवानियत थी,
और नन्ही सी जान आज अकेली खड़ी थी,
चीखी थी,
चिल्लाई थी,
पर पाक दरवाजों ने जैसे चुप्पी साध रखी थी,
मुस्लिम थी,
ईसाई थी,
या फिर हिन्दू थी,
क्या फर्क पड़ता है?
हवस की भूंख का निवाला बन फिर एक जिंदा लाश पड़ी थी,
जान थी,
बाकी अभी कुछ सांस थी,
और क्या होता बुरा?
जो जिंदा दफ़्न करने की जरूरत पड़ी थी।
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